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    Home»business»बीड़ी किस पत्ते से बनती है ? information of Beedi industries
    business

    बीड़ी किस पत्ते से बनती है ? information of Beedi industries

    arif khanBy arif khanNovember 18, 2019Updated:November 18, 2019No Comments23 Mins Read
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    क्या आपने कभी सोचा है कि बीड़ी किस पेड़ के पत्ते से बनती है ? या बीड़ी किस पत्ते से बनती है , बहुत से लोगों ने बीड़ी तो देखी होगी जो कई नामों से आती है। और अलग अलग जगहों पर अलग अलग प्रकार की बीड़ी प्रयोग मे लाई जाती है। जिसके नाम भी अलग हो सकते हैं।

    ‌‌‌लेकिन बीड़ी बनाने के लिए एक विशेष पेड़ के पत्ते का प्रयोग किया जाता है। इस पत्ते के अंदर तम्बाखू भर दिया जाता है। और उसके बाद इसको गोल बनाकर धागा बांध दिया जाता है। आप जो बीड़ी की सेफ देखते हैं। वह इसी प्रकार से बनाई जाती है।

    Table of Contents

    • बीड़ी किस पत्ते से बनती है bidi kis patte se banta hai
    • ‌‌‌तेंदू पत्ते का संग्रहण
    • ‌‌‌बीड़ी उधोग के बारे मे संक्षिप्त जानकारी
    • ‌‌‌बीड़ी उधोग के अंदर मजदूरी
    • ‌‌‌बीड़ी इंडस्ट्री के अंदर चाइल्ड लेबर
    • ‌‌‌ठेकेदार और उसका रोल
    • ‌‌‌वर्करों का आर्थिक शोषण
    • ‌‌‌प्रति व्यक्ति बीड़ी का उत्पादन कितना होता है?
    • ‌‌‌वर्कर की समस्याएं
    • बीड़ी मजदूरों के लिए सरकारी कानून ।
      • Bonded Labour System Act, 1976
      • The Child Labour (Prohibition and Regulation) Act, 1986
      • Minimum Wages Act, 1948
      • The Beedi and Cigar Workers  Act, 1966
      • Beedi Workers Welfare Fund Act, 1976
      • The Beedi Workers Welfare Cess Act, 1976
      • Equal Remuneration Act, 1976
      • The Factories Act, 1948
      • Employees State Insurance Act, 1948
    • ‌‌‌बीड़ी वर्कर और स्वास्थ्य समस्याएं
      • मस्कुलो-कंकाल या अस्थि-संबंधी समस्या
      • गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल पेट दर्द
      • श्वसन विकार
      • न्यूरोलॉजिकल समस्याएं
      • ‌‌‌आंखों की समस्याएं
      • ‌‌‌त्वचा से जुड़ी समस्याएं
      • साइटोजेनेटिक म्यूटेशन
      • ‌‌‌अन्य लक्षण
    • GST की मार बीड़ी उधोग पर

    बीड़ी किस पत्ते से बनती है bidi kis patte se banta hai

    ‌‌‌दोस्तों बीड़ी बनाने के लिए तेंदू नामक पेड़ के पत्तों का प्रयोग किया जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम Diospyros melanoxylon है। यह भारत और श्री लंका के अंदर पाया जाता है।इसको  मध्य प्रदेश में ‘तेन्दु’ तथा ओडिशा और झारखण्ड में ‘केन्दु’ कहते हैं। पेड़ के पत्ते में बहुमूल्य फ्लेवोन होते हैं ।  पत्तियों में पाए जाने वाले पेंटासाइक्लिक ट्राइटरपेन्स में रोगाणुरोधी गुण होते हैं।तेंदू पत्ते के अलावा बीड़ी बनाने के लिए कई जगह पर पलास और साल के पेड़ों के पत्तों का प्रयोग किया जाता है।

    bidi kis patte se banta hai
    By Pankaj Oudhia – Own work, CC BY-SA 3.0,wiki

    ‌‌‌यदि हम देश के अंदर तेंदू पत्ता के उत्पादन की बात करें तो इस मामले मे मध्यप्रदेश का पहला स्थान आता है। यह एक वर्ष के अंदर  25 लाख मानक बोरा तेंदू पत्ता का उत्पादन करता है।जो कि कुल उत्पादन का 25 प्रतिशत है।

    ‌‌‌तेंदू पत्तों को डायोसपायरस मेलेनोक्जायलोन नामक पेड़ से प्राप्त किया जाता है जो तेंदू की एक प्रजाति का नाम है।यह शुष्क प्रणपाति होती है। और यह नेपाल , गंगा के पठार ,मध्यप्रदेश ,महाराष्ट्र,यह नीलगिरी और सैरावली पहाड़ियों मे औरयह मालाबार और कोरोमंडल तक पाई जाती है।

    Texture, Flavour and Workability का तेंदू के पत्ते मे सबसे बड़ा गुण होता है। यह लंबे समय तक आसानी से आग जलाए रख सकता है। मार्च और अप्रेल के आस पास तेंदू झाड़ियों से तेंदू पत्ते एकत्रित किये जाते हैं।

    ‌‌‌तेंदू पत्ते का संग्रहण

    ‌‌‌बीड़ी बनाने के लिए तेंदू पत्ते का संग्रहण मजदूर करते हैं। वे तेंदू पत्ते को तोड़ने के लिए सुबह पांच बजे ही जंगल के अंदर चले जाते हैं।तेंदू पत्ता तोड़ने के लिए यह लोग अपने पूरे परिवार को भी लेकर जाते हैं। इसमे बच्चे भी होते हैं। हालांकि तेंदू पत्तों को बहुत ही सावधानी से तोड़ना होता है। ‌‌‌यदि सही तरीके से तेंदू पत्ता नहीं तोड़ पाते हैं या वह फट जाता है तो उसकी गुणवकता बेकार हो जाती है।इस काम को केवल वे ही लोग कर सकते हैं जो हमेशा से यही काम करते आए हैं।

    मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, झारखंड और छत्तीसगढ़ जैसी जगहो पर हजारों लोग मात्र तेंदू पत्तों को तोड़कर अपने परिवार का पेट पाल रहे हैं। ‌‌‌पत्ते तोड़ने वाले लोग बताते हैं कि यूं तो पत्ते पूरे साल ही रहते हैं। लेकिन जेठ माह के अंदर ही पत्ते बीड़ी बनाने  के लिए उपयोगी होते हैं। बाकी दिनों के अंदर पत्ते बेकार हो जाते हैं और वे फट जाते हैं या बीड़ी बनाने के लिए योग्य नहीं होते हैं।

    ‌‌‌मई जून महिने के अंदर तेंदू की पत्तों को एकत्रित किया जाता है। पत्तों को एकत्रित करने के बाद 50 या 100 पत्तों का बंडन बनाया जाता है और उसके बाद इनको धूप के अंदर सूखाने के लिए रखा जाता है।‌‌‌सूखी गडि्डयों पर पानी डालकर इनको फिर से सूखाया जाता है।‌‌‌

    यह सब करने के लिए जानकारी होना आवश्यक होता है नहीं तो पत्तों की गुणवता खराब हो सकती है।‌‌‌बंडल तैयार हो जाने के बाद उनको जूट के बोरों के अंदर रख दिया जाता है।और कुछ दिन सूरज की धूप दिखाने के बाद बेचने के लिए संग्रहित कर लिया जाता है।‌‌‌एक बोरे का वजन लगभग 75 केजी के आस पास हो जाता है।

    1960 से 70 के दशक में,तेंदू पत्तों की बागडोर को सरकार ने संभाला । पहले ठेकेदार इस क्षेत्र के अंदर काम करते थे जो मजदूरों को कम पैसा भी देते थे ।वर्तमान मे तेंदू पत्तों को एकत्रित करने का कारोबार राज्य के वन विभाग के अंदर आती है। और प्रत्येक तेंदू ईकाई कई संग्रह केंद्रो का प्रबंध करती है।‌‌‌तेंदू संग्रह के उपर एक ऐजेंट कार्य करता है जो तेंदू संग्रह की देख रेख के लिए रखा जाता है।एक लेखाकार जो संग्रह केंद्र में कार्यरत तेंदू बैग और भुगतान के सभी वितरण का प्रबंधन करता है।

    संग्रह केंद्रों से तेंदू के पत्तों को ले जाया जाता है। भंडारण के लिए राज्य के वन विभाग द्वारा संचालित गोदाम होते  हैं ।वहां पर इनको रखा जाता है।तेंदू की आधिकारिक नीलामी के लिए इनको विशिष्ट स्थानों पर ले जाया जाता है।यहां पर बड़े बड़े बीड़ी निर्माता और व्यापारी को आमंत्रित किया जाता है।

    ‌‌‌तेंदू पत्तों के काम काज के अंदर निम्न चीजें शामिल होती हैं।

    • व्यक्तिगत तेंदू उत्पादकों, तेंदू व्यापारियों और बीड़ी निर्माताओं का पंजीकरण करना।
    • राज्य सरकारों द्वारा नियुक्त एजेंट के पास तेंदू पत्तों को एकत्रित करवाने का अधिकार और देखरेख होना।
    • प्रत्येक के लिए खुली नीलामी के माध्यम से सालाना पत्तियों के थोक खरीदारों का चयन करना तेंदूपत्ता संग्राहकों के लिए हर साल मजदूरी की दर तय करना
    • परिवहन के माध्यम से राज्य के भीतर और बाहर पत्तियों के परिवहन को विनियमित करना।
    • Year   ‌‌‌तेंदू पत्तों का उत्पादन मैट्रिक टन मे
    • 2002-03   5,92,853
    • 2003-04   7,10,109
    • 2004-05   3,12,660
    • 2005-06   2,68,464
    • 2006-07   9,94,421
    • 2007-08  17,90,735

    ‌‌‌बीड़ी उधोग के बारे मे संक्षिप्त जानकारी

    दोस्तों बीड़ी उधोग पूरे भारत के अंदर फैला हुआ है और पूरे भारत के अंदर लाखों लोग इसकी मदद से अपनी आजीविका कमाते हैं। लेकिन इस काम के अंदर काफी ज्यादा अत्याचार होता है। ‌‌‌उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद जिले के अंदर बीड़ी उधोग काफी बड़ा है और यहां पर लगभग 3 लाख मजूदर काम करते हैं। काम करने वाले मजदूर काफी गरीब हैं और गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन करने वाले हैं। इनको न्यूनतम वेतन से कम मजूदरी दी जाती है। इतना ही नहीं इन पर अत्याचार भी किये जाते हैं। ‌‌‌यह बात कई अध्ययन के अंदर सामने आ चुकी है।

    ‌‌‌सबसे बड़ी बात तो यह है कि इस काम के अंदर लगभग 90 प्रतिशत महिलाएं शामिल हैं जो अपने परिवार के लिए अतिरिक्त आय जुटाने के लिए यह काम करती हैं। यह ठेकेदार के नीचे काम करती हैं और ठेकेदार से दिये जाने वाले सामान को अपने घर ले जाती हैं ।उसके बाद वे इस सामान के उपयोग से बीड़ी बनाती हैं।

    ‌‌‌बीड़ी उधोग असंठित कामगारों का सबसे बड़ा क्षेत्र है।सबसे बड़ी बात तो यह है कि इस उधोग के अंदर बीड़ी बनाने वाले मालिक कम रिस्क के अंदर बहुत ज्यादा मुनाफा कमा रहे हैं। Karnataka, Kerala, Madhya pradesh, west Benga जैसे राज्यों के अंदर बीड़ी बनाने का काम धड़ल्ले से चलता है।

    • ‌‌‌बीड़ी बनाने के लिए मजूदर तेंदू के पत्ते को सबसे पहले लाते हैं और उसके बाद उसको साफ किया जाता है। और काटकर सूखा दिया जाता है।
    • फिर इसके अंदर आवश्यक पदार्थ डाले जाते हैं। जोकि हर बीड़ी के अंदर होते हैं।
    • इसके बाद पत्तों को अच्छी तरीके से मोड़ा जाता है। और धागे से इसको बांधा जाता है।
    • अंत मे ‌‌‌25 बीडी का एक बंडल बना दिया जाता है।

    ‌‌‌सारा काम पूरा हो जाने के बाद सभी बीड़ी को ठेकेदार को सौंप दिया जाता है। यह ठेकेदार इस सामान को फ्रैक्ट्री के अंदर ले जाता है। वहां पर बंडल को भटी के अंदर 24 घंटे के लिए रखा जाता है। फिर इनके उपर एक कागज लगाया जाता है और लेबल लगाकर विभिन्न ईकायों को भेज दिया जाता है।

    ‌‌‌बीड़ी उधोग के बारे मे संक्षिप्त जानकारी
    By Dereleased – Taken while touring the beedi factory near Nileshwaram, Kerala, India, CC0,

    ‌‌‌रिसर्च मे यह भी सामने आया है कि इंडिया मे एक साल के अंदर लगभग 450 मिलियन रूपये बनते हैं और इसमे से केवल 160 मिलियन ही मजदूरी के अंदर खर्च होता है।ठेकेदार माल को वर्कर के घरों के अंदर सप्लाई करते हैं और उसके बाद मजूदरी के रूप मे मजदूरों को बहुत ही कम पैसा देते हैं।

    ‌‌‌इसके अलावा सन 1980 ई के अंदर हुए एक रिसर्च मे यह सामने आया है की बीड़ी बनाने से गरीब लोगों की कुल इनकम का 50 प्रतिशत हिस्सा आता है।बीड़ी उधोग के अंदर महिलाएं इस लिए अधिक शामिल हैं क्योंकि भारत मे आज भी अधिकतर महिलाएं ग्रहणी के रूप मे हैं और वे घर का काम तो करती ही हैं इसके अलावा वे ‌‌‌अपने फ्री समय के अंदर बीड़ी बनाने का काम भी करती हैं जिससे वे अपने परिवार की आर्थिक स्थिति के अंदर कुछ सुधार कर सकती हैं। हालांकि इस काम के अंदर लड़के बहुत कम शामिल हैं क्योंकि वे दूसरा काम करते हैं।

    ‌‌‌वैसे देखा जाए तो बीड़ी उधोग हो या कोई और उधोग लगभग हर जगह पर कामकाजी महिलाओं को 13 से 14 घंटे काम करना पड़ता है। जैसे यदि कोई महिलाएं बीड़ी बनाती हैं तो इनको अपने परिवार को भी संभालना होता है इसके अलावा घर के अन्य काम करने होते हैं।

    ‌‌‌जबकी बीड़ी उधोग के अंदर ठेकेदार एक पुरूष होता है और वही महिलाओं की बनाई बीड़ी को ग्रेड देता है या फिर वह उनको एक तय मानक के आधार पर रिजेक्ट भी कर सकता है। ‌‌‌इन सबके अलावा जो लड़कियां इस काम के अंदर जुड़ जाती हैं वे शिक्षा जैसी चीजों से दूर हो जाती हैं और बीड़ी बनाने से स्वास्थ्य खतरा भी कम नहीं होता है । इसकी तो महिलाओं को कोई ज्यादा जानकारी भी नहीं होती है।

    ‌‌‌बीड़ी उधोग के अंदर मजदूरी

    बीड़ी उधोग के अंदर मजूदरी जैसी कोई चीज नहीं है। क्योंकि 1000 बीड़ी बनाने पर 102 रूपये मजदूरी मिलती है जोकि सरकार ने निर्धारित की है। लेकिन यह सच्चाई नहीं है। बीड़ी बनाने वाले मजदूरों का शोषण किया जाता है।‌‌‌ठकेदार 1200 से 1300 बीड़ी बनाते हैं और इतनी बीड़ी बनाने के लिए कम से कम 10 घंटे के समय की आवश्यकता होती है। इसके अलावा कौशल की भी आवश्यकता होती है। 200 या 300 बीड़ी एक्स्ट्रा ली जाती हैं। और इनका पैसा भी मजदूरों को नहीं दिया जाता है। ठेकेदार 1000 बीड़ी के 70 रूपये तक देते हैं जो बहुत ही कम है।‌‌‌मजदूर इस बारे मे कई बार शिकायत भी कर चुके हैं। लेकिन उनकी शिकायत पर कोई ध्यान नहीं दे रहा है।

    ‌‌‌बीड़ी इंडस्ट्री के अंदर चाइल्ड लेबर

    ‌‌‌बीड़ी उधोग के अंदर चाइल्ड लेबर भी काम कर रही है। नए रिसर्च पेपर के अंदर यह बात सामने आई है कि  Andhra प्रदेश मे कुल चाइल्ड लेबर का 4.5 प्रतिशत काम कर रही है जो पूरे इंडिया के चाइल्ड लेबर का 13 प्रतिशत बताया गया है। ‌‌‌आंकड़ों पर नजर डालें तो यह बात भी सामने आ रही है कि महिला चाइल्ड वर्कर लड़कों की तुलना मे ज्यादा काम कर रहे हैं जो इस बात को साबित करने के लिए काफी है कि लड़कियां भी जल्दी स्कूल छोड़ रही हैं या वे स्कूल जाती ही नहीं हैं।

    ‌‌‌सर्वे के अंदर यह भी पता चला है कि बीड़ी इंडस्ट्री के अंदर अधिकतर वे महिलाएं काम करती हैं जिनके पति अच्छा पैसा नहीं कमा पाते हैं जो गरीब तबके की हैं। यह महिलाएं अपने बड़े परिवार की जरूरतों को पूरा करने के लिए यहां पर काम करती हैं। ‌‌‌बीड़ी उधोग की एक सबसे बड़ी बात यह भी है कि इसके अंदर बहुत से वर्कर की आवश्यकता होती है। और इसमे आसानी किसी को काम भी मिल जाता है। बस उसे बीड़ी बनाने के बारे मे कुछ जानकारी होनी चाहिए । मांग की बात करें तो मांग भी इसकी अच्छी खासी है।

    ‌‌‌ठेकेदार और उसका रोल

    बीड़ी इंडस्ट्री के अंदर ‌‌‌ठेकेदार  काफी महत्वपूर्ण रोल प्ले करता है। ठेकेदार इंडस्ट्री के मालिकों से कान्टेक्ट रखता है और वे उसे कच्चा माल देते हैं ताकि उसकी मदद से बीड़ी बनाई जा सके ।और ठेकेदार वर्कर से संपर्क रखता है । वह कच्चे माल को अपने वर्कर को सप्लाई कर देता ‌‌‌है। जो कि घर घर के अंदर काम करने वाले वर्कर होते हैं। माल पहुंचाने के लिए ठेकेदार अपने पास मजूदर रखते हैं जो बना हुआ माल लेकर आते हैं और कच्चा माल देकर आते हैं।

    ‌‌‌जैसा कि हमने आपको उपर बताया बीड़ी बनाने के लिए स्किल की आवश्यकता होती है और जो लोग घरों के अंदर यह काम करते हैं तो वे अपने 4 से 5 साल के बच्चों को बीड़ी बनाना सीखाने लगते हैं। और जब वे बड़े होते जाते हैं तो अच्छी तरह से बीड़ी बनाना सीख जाते हैं।

    ‌‌‌वैसे देखा जाए तो ठेकेदार वाला सिस्टम सही नहीं होता है। इसमे वर्कर को फिक्स अमाउंट के अंदर रॉ मटैरियल दिया जाता है।और इसकी मदद से फिक्स अमांउट बीड़ी बनानी होती  हैं। ‌‌‌वर्कर को 350 ग्राम तंबाखू और 800 ग्राम तेंदू के पत्तों से 100 बीड़ी बनानी होती हैं।और यह ठेकेदार डिसाइड करता है कि बीड़ी की क्वालिटी कैसी है?

    ‌‌‌और यदि ठेकेदार बीड़ी के बंडल को रिजेक्ट कर देता है तो वर्कर का नुकसान होता है। ऐसी स्थिति के अंदर वर्कर काम तो खोता ही है इसके अलावा उसे रोमैटेरियल का नुकसान भी भरना होता है। और यदि वह फैक्ट्री मालिक से इसकी शिकायत करता है कि खराब पत्ते होने की वजह से ऐसा हुआ है तो

    ‌‌‌ठेकेदार उल्टा वर्कर पर ही दोषारोपण करता है और बोला जाता है कि तब तक आप काम बंद कर सकते हो जब तक की सही तेंदू के पत्ते नहीं आ जाते । और जाहिर तौर पर वर्कर काम बंद नहीं करना चाहता है। ऐसी स्थिति के अंदर उसे जो ठेकेदार कहता है उसी के अनुसार काम करना पड़ता है।

    ‌‌‌वर्करों का आर्थिक शोषण

    भारत के बीड़ी उधोग पर अनेक प्रकार के रिसर्च पेपर प्रकाशित हो चुके हैं। इनके अंदर यह दावा किया जाता रहा है कि कुछ बिचौलिये वर्करों का आर्थिक शोषण भी करते हैं। यह लोग खराब माल की आपूर्ति करते हैं और जब इस माल से उत्पादित होने वाली बीड़ी उचित गुणवता की नहीं होती ‌‌‌है तो वे इसे रिजेक्ट कर देते हैं और बाद मे इसको फ्री के अंदर ही लेलेते हैं। वर्कर को इन बिचौलियों की बात को मानना होता है।

    ‌‌‌वैसे जो मजदूर बंधुवा मजदूर बन जाते हैं उनका शारीरिक और मानसिक शोषण भी किया जाता है। इस संबंध मे कई कहानी मौजूद हैं। आमतौर पर बीड़ी बनाने से बहुत कम पैसा मिलता है और इतने पैसों के अंदर घर चलाना बहुत ही मुश्किल होता है। ऐसी स्थिति मे ठेकेदार से कर्ज लेना ही पड़ता है।‌‌‌और एक बार जब कर्ज लेलिया तो फिर इसको उतारना बहुत ही कठिन हो जाता है। क्योंकि कमाई इतनी नहीं रह पाती है।

    • ‌‌‌एक लड़की अपनी कहानी शेर करती हुई बताती है कि मेरे घर की आर्थिक दसा बहुत ही खराब है और मेरे मां और बाप इस काम के बारे मे नहीं जानते हैं लेकिन दो वक्त की रोटी का जुगाड़ करने के लिए मेरे मां बाप ने मुझे बीड़ी बनाने के काम के अंदर लगा दिया ।‌‌‌मैंने कक्षा 6 तक पढ़ाई की है। एक साल पढ़ाई छूटने के बाद भी मैं पढ़ाई कर सकती हूं । यदि मैं इस काम से किसी तरह से निकलने मे कामयाब रही तो ? यह काम बहुत ही मुश्किल है और कई घंटो बैठा रहना पड़ता है लेकिन 10 घंटे काम करने के बाद भी उतना अच्छा पैसा नहीं मिल पाता है कि अच्छे से जिंदगी कट सके।‌‌‌और मेरे जैसी लड़की के लिए 3000 बीड़ी का मुंह बंद करना काफी मुश्किल है ।
    • ‌‌‌इस धंधे से जुड़ा एक अन्य लड़का अपनी दास्तां को शैयर करता हुआ बताता है .. ‌‌‌यदि बीड़ी का मुंह बंद करने मे मुझसे जरा सी भी गलती हुई तो मेरे मालिक मुझे पीट देते हैं। हमारी गलती सिर्फ इतनी है कि हमने मालिक से कुछ एडवांस ले रखा है। मालिक मेरी गर्दन के उपर माचिस की डिब्बी रख देते हैं और यदि मैं गर्दन को इधर उधर हिलाता हूं तो डिब्बी नीचे गिर जाती है और उसके बाद ‌‌‌उसकी आवाज को सुनकर मालिक मेरे पास आते हैं किसी प्रकार की दया किये बिना बिजली के तार से मारते हैं । और मेरे माता पिता को भी भला बुरा कहते हैं।

    ‌‌‌प्रति व्यक्ति बीड़ी का उत्पादन कितना होता है?

    ‌‌‌प्रतिदिन बीड़ी बनाने की मात्रा लेबर की कुशलता पर निर्भर करती है। जो लोग बीड़ी बनाने के बारे मे थोड़ा जानते हैं या उनको कम अनुभव है वे प्रतिदन मे केवल 300 के आस पास ही बीड़ी बना पाते हैं। लेकिन जिन लोगों को इस काम का अच्छा खासा अनुभव है वे प्रतिदन 1000 से 1200 तक बीड़ी बना देती हैं।‌‌‌हालांकि जो महिलाएं घर का काम भी करती हैं वे इतनी संख्या के अंदर बीड़ी नहीं बना पाती हैं।

    ‌‌‌वर्कर की समस्याएं

    दोस्तों बीड़ी उधोग के अंदर असंगठित क्षेत्र संगठित क्षेत्र से अधिक है। मतलब कि बहुत से ऐसे वर्कर हैं जो कम पैसे के अंदर काम करते हैं और उनको सरकार की यौजनाओं के बारे मे कोई भी जानकारी नहीं होती है।

    • कोई स्पष्ट व्यावसायिक वर्गीकरण नहीं
    • बहुत छोटी बिखरी इकाइयों में काम करना।
    • कम प्रौद्योगिकी, कम उत्पादकता और कम कमाई में कार्यरत
    • श्रमिकों के पास बहुत कम शिक्षा और खराब कौशल है।
    • महिला श्रमिकों का कई तरह से शोषण किया जाता है।
    • सामाजिक सुरक्षा की अनुपस्थिति।
    • ‌‌‌बिचौलिए महिलाओं का शोषण करते हैं ।
    • न्यूनतम वेतन अधिनियम का पालन नहीं किया जाता है।
    • असुरक्षा की भावना ।
    • यौन उत्पीडन किया जाता है।
    • चाइल्डकैअर और मातृत्व लाभ के लिए कोई प्रावधान नहीं।
    • संसाधनों तक पहुंच का अभाव।
    • तकनीक के चुनाव की समस्या।

    बीड़ी मजदूरों के लिए सरकारी कानून ।

    बीड़ी कामगारों पर ध्यान देने के लिए सरकार ने कई आयोगों की स्थापना की थी।पहला आयोग 1933 में बनाया गया था। जिसे रॉयल कमीशन ऑन लेबर (RCL) कहा जाता था।1946 में, मद्रास सरकार ने कोर्ट ऑफ इन्क्वायरी नियुक्त की थी। इसकी रिपोर्ट के अंदर यह कहा गया की बीड़ी कामगार ।

    ‌‌‌सन 1954 ई के अंदर भारत सरकार ने बीड़ी उधोग की स्थिति का आंकलन करने के लिए अधिकारियों की नियुक्ति की थी।भारत सरकार ने भारत में बीड़ी कारखानों के दौरान एक अध्ययन किया 1965-66 और बीड़ी मजदूरों की दयनिए स्थिति का चिरत्रण किया गया ।

    1994 में, भारत सरकार ने एक समिति नियुक्त की । इस समिति ने बीड़ी उधोग के अंदर काम करने वाली कामगारों की स्थिति को चित्रित किया था।

    Bonded Labour System Act, 1976

    बंधुआ श्रम प्रणाली एक ऐसी प्रणाली है जिसके अंदर मजदूर को बंधुआ मजदूर बना लिया जाता है और उसके बाद उससे जबरन काम करवाया जाता है।आमतौर पर जब मजूदर अपने ठेकेदार से कुछ कर्ज ले लेता है और उसे चुका नहीं पता है तो ठेकेदार मजदूर से तब तक काम करवाता है जब तक कि वह पैसे उतर नहीं जाते हों ।‌‌‌और मजदूरों का आर्थिक शोषण भी किया जाता है।‌‌‌इस अधिनियम का प्रमुख उदेश्य यह है कि बीड़ी उधोग और दूसरे उधोग के अंदर काम करने वाले बंधुआ मजदूरी प्रथा को रोकना।

    The Child Labour (Prohibition and Regulation) Act, 1986

    ‌‌‌बीड़ी उधोग के अंदर बच्चों को कामकाजी परिवार की मदद करने के रूप मे पेश किया जाता है।यह कानून बच्चों के शोषण और जबरदस्ती काम करवाने से बचाने के लिए है।यह अधिनियम बच्चों के  स्वास्थ्य और कुछ अन्य व्यवसायों में उनकी कामकाजी परिस्थितियों को नियंत्रित करता है।

    बीड़ी निर्माता बीड़ी बनाने के लिए बच्चों को औपचारिक रूप से नियुक्त नहीं करते हैं।भारत के बाल श्रम कानून के अंदर उन बच्चों को शामिल नहीं किया जाता है जो परिवार की मदद करते हैं।यही कमी बीड़ी के रोलिंग में बच्चों के रोजगार की अनुमति देता है।

    ‌‌‌14 साल से कम उम्र के बच्चों के लिए  रेलवे द्वारा परिवहन, बांधने की मशीन, राख के गड्ढों की सफाई, भवन संचालन,रेलवे परिसर या बंदरगाहों, बीड़ी में निर्माण, खानपान प्रतिष्ठान बनाने, कालीन बुनाई, सीमेंट निर्माण, कपड़ा छपाई, रंगाई, बुनाई, माचिस, विस्फोटक और आतिशबाजी का निर्माण जैसे काम पूरी तरह से ‌‌‌वर्जित है।

    Minimum Wages Act, 1948

    ‌‌‌यह न्यूनतम मजदूरी अधिनियम है जो उन जगहों पर न्यूनतम मजदूरी तय करता है जहां पर श्रम  संगठन अस्तित्वहीन या अप्रभावी हैं।यक कानून काम के घंटे ,उचित आराम और भुकतान को तय करके मजूदरों की सुरक्षा करता है। वर्षों के प्रयास के बाद मजूदरों के रहन सहन मे सुधार हो रहा है।‌‌‌यह अधिनियम बीड़ी उधोग के श्रमिकों पर लागू होता है क्योंकि इस क्षेत्र के अंदर अधिकर कामगार असंगठित हैं।‌‌‌इसके अलावा सरकार ने बीड़ी उधोग के कामगारों के लिए दो कानून और बनाएं हैं। Act 1966, Beedi ,Workers Welfare Fund Act, 1976. ।

    The Beedi and Cigar Workers  Act, 1966

    बीड़ी उद्योग में श्रमिकों के रोजगार को विनियमित करने के लिए यह अधिनियम बनाया गया था।इस अधिनियम का प्रमुख उदेश्य कारखानों के अंदर काम करने वाले श्रमिकों को नियंत्रित करता है।‌‌‌बीड़ी औद्योगिक परिसरों के लाइसेंस की आवश्यकता होती है।उधोगों को स्वच्छता और वेंटिलेशन के मानकों को पूरा करना होता है। पुरूषों और महिलाओं के लिए अलग अलग शौचालय व मूत्रालय होना जरूरी है।

    प्राथमिक चिकित्सा , कैंटीन और देखभाल की सुविधाएं होनी चाहिए ।कार्यस्थलों पर 250 कर्मचारी या अधिक होने पर काम ,आराम की स्थितियों को नियंत्रित करता है।

    Beedi Workers Welfare Fund Act, 1976

    ‌‌‌इस अधिनियम का प्रमुख उदेश्य बीड़ी श्रमिकों और उनके परिवारों के लिए कल्याणकारी योजनाएं, स्वास्थ्य से संबंधित,शिक्षा, मातृत्व लाभ, समूह बीमा, मनोरंजन, आवास सहायता, बीड़ी श्रमिकों, और पीने के पानी के बच्चों के लिए छात्रवृत्ति का लाभ देने के लिए कदम उठाना है।

    The Beedi Workers Welfare Cess Act, 1976

    ‌‌‌यह अधिनियम बीड़ी श्रमिकों को कल्याणकारी लाभ प्रदान  करने के लिए बनाया गया है।उत्पाद शुल्क के माध्यम से एकत्र किए गए उपकर के माध्यम से बीड़ी श्रमिक कल्याण कोष की स्थापना की गई है।यह उपकर केंद्रीय द्वारा समय-समय पर संशोधित किया जाता है। इसके अलावा बीड़ी बनाने वाले मजदूरों को पहचान पत्र जारी किया जाता है।

    Equal Remuneration Act, 1976

    ‌‌‌भारत के अंदर आमतौर पर महिला को और पुरूष को समान काम के लिए असमान वेतन मिलता है। महिलाओं को कम वेतन मिलता है जो एकदम से अनुचित है। इस कानून के अंदर यह बात कही गई है कि महिलाओं को और पुरूष को समान काम के लिए समान वेतन मिलना चाहिए यह कानून लिंग आधारित भेदभाव को रोकता है।

    The Factories Act, 1948

    इस अधिनियम का उद्देश्य पर्याप्त सुरक्षा उपायों को सुनिश्चित करना और बढ़ावा देना है कारखाना श्रमिकों का स्वास्थ्य और कल्याण को और अधिक मजबूत करना ।

    Employees State Insurance Act, 1948

    यह अधिनियम स्वास्थ्य कवरेज, चिकित्सा देखभाल और नकद लाभ प्रदान करता है बीमारी, प्रसूति, रोजगार की चोट और आश्रितों को पेंशन के मामले में अधिक लाभ प्रदान करने के लिए बनाया गया है।

    ‌‌‌बीड़ी वर्कर और स्वास्थ्य समस्याएं

    ‌‌‌जो बीड़ी वर्कर होते हैं उनके घर मे तंबाखू लंबे समय तक रहती है औरइस वजह से दीर्घकालिन स्वास्थ्य समस्याएं पैदा करती है।यह परिवार के हर सदस्य पर बुरा प्रभाव डालती है। कई महिलाएं बीड़ी बनाती रहती हैं। और उन्हीं हाथों से अपने बच्चों को स्तनपान करवाती रहती हैं ।‌‌‌बीड़ी वर्कर के अंदर कई प्रकार की स्वस्थ्य समस्याएं देखने को मिलती हैं। जैसे दर्द और दर्द, खांसी, चक्कर आना, पेट में दर्द, आंखों में जलन, पैर में दर्द,अंगुलियों में सुन्नता, सांस फूलना, गैस, स्पासमोडिक दर्द, बवासीर, मूत्र में जलन, सफेद डिस्चार्ज, पल्पिटेशन, घरघराहट, बुखार, चिंता, जोड़ों में दर्द और सूजन ‌‌‌आदि।

    ‌‌‌कई रिसर्च के अंदर बीड़ी मजदूरों के प्रतिकूल स्वासथ्य की सूचना मिली है। जैसे मुंह के अंदर फोड़े हो जाना और गले के अंदर जलन होने की सूचना मिली है।तमिलनाडु के तिरुनेलवेली में बीड़ी श्रमिकों के बीच पेट में असुविधा की सूचना मिली थी।

    2014 में उत्तर प्रदेश में 214 बीड़ी श्रमिकों के बीच एक अध्ययन किया गया 20-75 की आयु समूह ने दिखाया कि 33.8 प्रतिशत नेत्र समस्याओं से ग्रस्त थे, 22.68 प्रतिशत श्वसन संबंधी समस्याएं थीं, 48.05 प्रतिशत ने ओस्टियोलॉजिकल समस्याओं का अनुभव किया, 29.68 प्रतिशत त्वचा की समस्या थी और 14.81 प्रतिशत श्रमिक सिरदर्द ‌‌‌से पीड़ित भी थे ।

    ‌‌‌सन 2014  ई के अंदर हुए एक अन्य रिसर्च मे तमिलनाडु के कामगारों के फेफड़ों के कार्यों मे कमी होने की सूचना भी दी गई थी।वैसे एक बीड़ी कामगार को अनेक प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। जैसे तंत्रिका संबंधित समस्या , नेत्र संबंधित समस्या ,त्वचा रोग ,साइटोजेनिक समस्याएं, आदि।

    ‌‌‌जब रिसर्च कर्ता एक महिला का साक्षात्कार ले रहे थे तो उसके गोद के अंदर एक बच्चा था। वह रोए जा रहा था। महिला उसको चुप कराने की भरपूर कोशिश कर रही थी। लेकिन वह चुप नहीं हो रहा था। मां ने बच्चे को स्तन से लगाया और उसको दूध पिलाने की कोशिश की क्योंकि मां को लग रहा था कि बच्चा भूखा हैं‌‌‌ लेकिन बच्चे ने इसमे कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। उसके बाद मां ने बच्चे के मुंह से तम्बाखू के दो टुकड़े निकाले ।

    मस्कुलो-कंकाल या अस्थि-संबंधी समस्या

    बीड़ी उधोग के अंदर काम करने वाले मजदूरों को मस्कुलो-कंकाल या अस्थि-संबंधी समस्या हो सकती है। इसके कुछ लक्षण निम्न हैं।

    कंधे में दर्द, गर्दन में दर्द, घुटने में दर्द, ऐंठन, अंगों में सूजन, गठिया, आसन समस्याओं, मांसपेशियों में प्रवेश, संयुक्त दर्द और सूजन यदि ऐसे ‌‌‌लक्षण दिखाई देते हैं तो तुरन्त अपने डॉक्टर से संपर्क करें ।

    गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल पेट दर्द

    बीड़ी बनाने वाले मजूदरों के लिए यह समस्या बहुत ही आम है। उनके पेट मे गैस हो जाती हैं ।एसिडिटी, गैस्ट्रिक, परेशानी,उल्टी, दस्त, कब्ज होना ।

    श्वसन विकार

    आमतौर पर जब तम्बाखू को बीड़ी के अंदर डाला जाता है तो सांस के साथ तंबाखू अंदर भी जाता रहता है। जिसकी वजह से सांस से संबंधित विकार हो जाते हैं। इन विकारों के अंदर तपेदिक (टीबी), क्रोनिक ब्रोंकाइटिस, अस्थमा, सांस फूलना, खांसी, छींक आना, गला जलना, सर्दी, एलर्जी, फेफड़े का कैंसर आदि।

    न्यूरोलॉजिकल समस्याएं

    तंबाखू केवल हमारे शरीर को ही रोगग्रस्त नहीं करता है वरन यह कई न्यूरोलॉजिकल समस्याएं  भी पैदा करता है जैसे सिरदर्द, गिडनेस, मतली आदि ।

    ‌‌‌आंखों की समस्याएं

    बीड़ी बनाने वाले मजूदरों को आंखों की समस्याएं भी होती हैं।आंखों से जुड़ी समस्यांओं मे आँखों में पानी आना, आँखों में जलन, आँखों में दर्द, आँखों में दर्द, दोहरी दृष्टि आदि । ऐसे लक्षण प्रकट होने के तुरन्त ही डॉक्टर को दिखाया जाना चाहिए।

    ‌‌‌त्वचा से जुड़ी समस्याएं

    बीड़ी कामगारों को त्वचा से जुड़े रोग भी हो जाते हैं।जिल्द की सूजन, एक्जिमा,  त्वचा का मोटा होना, त्वचा का कैंसर आदि ।

    साइटोजेनेटिक म्यूटेशन

    बीड़ी बनाने से डिएनए के अंदर बदलाव आते हैं जो अनेक समस्याओं का कारण बन सकते हैं। जैसे डीएनए क्षति, क्रोमोसोमल गर्भपात, जीनोटॉक्सिसिटी आदि।

    ‌‌‌अन्य लक्षण

    बीड़ी बनाने वालों पर किये गए अनेक अध्ययन मे कई समस्याएं सामने आई हैं जो उनके स्वास्थ्य से जुड़ी हैं। और इस बात का दावा किया जा रहा है कि यह रोग तंबाखू के द्रुष्ट प्रभाव की वजह से होते हैं।आरबीसी, डब्लूबीसी, प्लेटलेट काउंट और में कमी हीमोग्लोबिन का स्तर, एनीमिया इसके अलावा भूख की हानि,थकान, बुखार, पाइल्स, श्वेत प्रदर,घबराहट, घरघराहट, चिंता।

    GST की मार बीड़ी उधोग पर

    ‌‌‌आपको पता ही है कि GST ने कई उधोग धंधों को चौपट करके रख दिया और लाखों लोग बेरोजगार हो गए ।इसका असर पर बीड़ी उधोग पर भी बहुत पड़ा है। जिसके चलते बीड़ी कामगारों मे रोजी रोटी का संकट पैदा हो गया है।‌‌‌आपको बतादें कि मध्यप्रदेश के अंदर बहुत बड़ी आबादी बीड़ी उधोग से जुड़ी है। जब छोटे उधोगों पर जीएसटी की मार पड़ी तो वे तुरन्त ही बंद हो गए ।और उनके अंदर काम करने वाले लोग बेरोजगार हो गए ।

    ‌‌‌बीड़ी उधोग के बंद होने का सबसे बड़ा कारण तो यह रहा है कि बीड़ी पर 28 प्रतिशत तक जीएसटी लग गई । जिसका परिणाम यह हुआ कि बीड़ी पीने वालों की संख्या घट गई और जब संख्या कम हुई तो मांग भी कम हो गई। जिसकी वजह से उत्पादन कम हुआ और लोग बेरोजगार हो गए ।

    ‌‌‌पहले बीड़ी के अंदर 20 प्रतिशत वैल्यू एडेड टैक्स लगता था। लेकिन अब तेंदू पत्ते के संग्रहण पर 18 फीसदी और तेंदू पत्ते से बीड़ी बनाने पर 28 फीसदी टेक्स लगता है। कुल मिलाकर 46 फीसदी टेक्स बीड़ी पर लग रहा है जबकि सिगरेट पर केवल 28 फीसदी जिएसटी लग रही है । इस वजह से लोग ज्यादा सिगरेट पिना ‌‌‌ज्यादा पसंद करते हैं।

    बीड़ी किस पत्ते से बनती है लेख आपको कैसा लगा नीचे कमेंट करके हमें बताएं ।

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