जलियांवाला बाग नरसंहार Jallianwala Bagh Massacre

‌‌‌‌‌‌जलियांवाला बाग नरसंहार या जलियांवाला बाग के बारे मे जानने के लिए यह लेख पूरा पढ़ें ।

जलियांवाला बाग भारत के पंजाब प्रांत के अंदर अम्रतसर के स्वर्ण मिंदर के निकट पड़ता है।13 अप्रेल 1919 को यहां पर रोल्ट एक्ट के विरोध मे एक सभा हो रही थी । जिसपर एक अंग्रेजी जनरल डायर ने गोलियां चला दी थी ।इस ‌‌‌जलियांवाला कांड के के अंदर 1000 से अधिक लोग मारे गए थे और 2000 से अधिक लोग घायल हो गए ‌‌‌थे ।लेकिन अंग्रेज सरकार ने केवल 200 लोगों के घायल होने और 400 लोगों के शहीद होने की बात को ही स्वीकार किया था ।‌‌‌यह वह घटना थी । जिसने स्वतंत्रता संग्राम पर अधिक दबाव डाला था।

‌‌‌अंग्रेजों का रैवया

प्रथम विश्व 1914- 1918 युद्व के अंदर ब्रिटिश सरकार ने 13 लाख भारतिए सैनिकों कों युद्व के लिए भेजा था । जिसमे से 40000 सैनिक शहीद हो गए । लेकिन जो आसा उसके बाद लोग अंग्रेज सरकार से कर रहे थे ।मॉण्टेगू-चेम्सफ़ोर्ड सुधार ने उसको पूरी तरह से गलत साबित कर डाला। ‌‌‌प्रथम विश्व युद्व के दौरान पंजाब प्रांत के अंदर अंग्रेजों का विरोध काफी बढ़ चुका था । जिसको कुचला भी गया था ।सिडनी रॉलेट जज के निर्देशन के अंदर एक समीति बनाई गई जिसका यह अध्ययन करने का काम था कि पंजाब के अंदर अंग्रेजों का विरोध किस विदेसी ताकत के सहारे हो रहा है।

‌‌‌उसके बाद भारत प्रतिरक्षा विधान (1915) का और अधिक विस्तार किया गया और रॉयेल्ट एक्ट लागू किया गया और अंग्रेज सरकार को और अधिक अधिकार दिये गए । वह अब बिना वारंट किसी को भी गिरफतार कर सकती थी। नेताओं को जेल मे डाल सकती थी। बंद कमरें मे मुकदमा चला सकती थी । इसके विरोध मे पूरा भारत खड़ा

‌‌‌हुआ और अनेक गिरफतारियां भी हुई।

‌‌‌गांधी जी और रोलेट एक्ट

उस समय गांधीजी की लोकप्रियता भी बढ़ चुकी थी । गांधीजी के नेत्रत्व के के अंदर रालेट एक्ट का विरोध प्रारम्भ हुआ । अंग्रेज सरकार ने नेताओं और लोंगों को कड़ी सजाएं दी । अनेक लोगों को जेल मे डाल दिया गया ।इस वजह से जनता का आक्रोश बढ़ गया और लोगों ने रेल और तार सेवाओं को‌‌‌नष्ट कर डाला ।

सत्यपाल और सैफ़ुद्दीन किचलू को गिरफतार कर लिया गया और कालापानी की सजा देदी गई। 1919 को अम्रतसर के अंदर कमीश्नर के घर के सामने लोगों ने नेताओं को छोड़ने के लिए शांति प्रिय प्रदर्शन किया । लेकिन अंग्रेजों ने लोगों पर गोलियां चलादी । जिससे लोग उग्र हो गए औश्र कुछ अंग्रेजों को मार डाला । इस ‌‌‌हमले के अंदर 30 भारतिए मारे गए थे ।

‌‌‌महात्मा गांधी की गिरफतारी

ब्रिटिश सरकार ने जलियांवाला बाग के अंदर सभा मे भाग लेने जा रहे गांधीजी को 10 अप्रेल को पल्लवल रेलवे स्टेशन से गिरफतार कर लिया । अपने नेताओं की गिरफतारी से लोग और अधिक भड़क गए । और 13 अप्रैल 1919 को हिंदू मुस्लिम और सीख सब धर्मों के लोग जलियांवाला बाग के ‌‌‌अंदर सभा मे शामिल होने पहुंचे । उनकी एकता देकर ब्रिटिश सरकार को खतरा नजर आया और डायर ने आंदोलन की कमर तोड़ने के लिए ।लोगों पर गोलियां बरसादी ।

‌‌‌जलियांवाला बाग हत्याकांड

बैसाखी के दिन 13 अप्रैल 1919 को अमृतसर के अंदर एक सभा रखी गई थी। जबकी पूरे शहर के अंदर कर्फ्यू लगा हुआ था । बैसाखी का दिन होने से सभा की बात सुनकर कोई 5000 लोग ‌‌‌जलियांवाला बांग के अंदर एकत्रित हो गए । उसके बाद जब नेता भाषण दे रहे थे तो जनरल डायर 90 सैनिकों के साथ वहां पर आ पहुंचा और बिना चेतावनी ‌‌‌के लोगों पर फायर करना शूरू कर दिया । 1650 राउंड फायर किये गए । ‌‌‌जलियांवाला बाग के निकले और अंदर आने का एक ही रास्ता है। सो इस वजह से लोग बाहर नहीं जा सके । और कुछ लोग तो अंग्रेजों की गोलियों से बचने के लिए जिंदा ही कुए के अंदर कूद गए । कूए मे 200 लोग कूद चूके थे । उसके अंदर भी लाशों का ढेर ‌‌‌लग चुका था ।‌‌‌

इस कांड के अंदर अधिकारिक तौर पर 1000 लोग मारे गए थे और 2000 हजार से ज्यादा लोग घायल हो चुके थे । लेकिन ब्रिटिश सरकार ने केवल 200 लोगों के मारे जाने की पुष्टिी की जो एकदम से गलत था ।

‌‌‌डायर का घटिया बयान

डायर ने अपने उपर अधिकारियों को बयान भेजा कि उस पर भारतियों की एक फौज ने हमला किया जिस वजह से उसको गोलियां चलानी पड़ी ।उसके बाद उसे उपर से रिस्पांस मिला कि तुमने सही किया ।

जनरल डायर ने स्वीकार किया कि उसने यह सब जानबूझ कर किया था । उसने कहा कि यदि उसके पास और जिंदा कारतूस होते तो वह और अधिक लोगों को मार सकता था । लेकिन उसके पास कारतूस नहीं होने की वजह से बहुत से लोग जिंदा बच गए थे । ‌‌‌एक कांग्रेस जांच कमेटी के अनुसार 1000 से अधिक लोग इसके अंदर मारे गए थे । और गोलियां भारतिय सैनिकों से चलवाई गई थी। उनके पीछे अंग्रेजी सेनिक तौपें लेकर खड़े थे । यदि कोई भारतिय सैनिक गोली चलाने से इनकार करता तो अंग्रेज उसी को भी गोली से उड़ा सकते थे ।

‌‌‌इस बर्बर हत्याकांड के बाद पंजाब मे 15 अप्रैल को मॉर्शल ला को लागू कर दिया गया था ।जिसकी वजह से 300 लोगों को गिरफतार कर लिया गया ।सदस्य शंकर नायर ने अपने पद से इस्तीफा देदिया । और रविन्द्रनाथ टैगोर ने कहा मैं अब मेरे देश के लोगों के साथ विशेष उपाधि से रहित होकर खड़ा होना चाहता हूं ।

‌‌‌निंदा और विरोध

जलियांवाला बाग हत्याकांड की जबरदस्ता निंदा हुई। पूरी दुनिया के अंदर इसका विरोध हुआ । जिससे अंग्रेजी सरकार दबाव के अंदर आ गई।इसके बाद जलियांवाला बाग हत्याकांड की जांच के लिए हंटर कमिशन की नियुक्ति की गई। उसके बाद तो डायर ने भी स्वीकार किया की वह भारतियों को मारने ‌‌‌का ईरादा पहले से ही करके आया था । वह साथ मे दो तोप भी लाया था । लेकिन वह उसके संकरे रस्ते के अंदर आ ना सकी ।1920 मे डायर की पदोन्नति की गई और उसे कर्नल बना दिया गया । उसको भारत के अंदर पद नहीं दिया जाने का निर्णय लिया । विश्वव्यापी विरोध को देखते हुए अंग्रेज सरकार ने निंदा प्रस्ताव ‌‌‌पारित किया और उसको अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा ।‌‌‌रविंद्रनाथ टैगोर ने जलियांवाला बाग हत्या कांड के विरोध मे अपनी नाइट हुड की उपाधि को वापस देदिया । इस हत्याकांड के बाद जनता का हौसला पस्त नहीं हुआ वरन और अधिक बढ़ गया । लोगों ने जलियांवाला बाग की रेत को माथे पर लगाया और । आजादी के अंदर कूद पड़े ।

‌‌‌जलियांवाला बाग हत्या कांड स्टोरी

12 अप्रेल 1919 को जब डायर ने जगह जगह पर अमरतसर के अंदर सभाएं होती देखी जोकि पीछले गोली कांड और रोएल्ट एक्ट के विरोध मे हो रही थी तो डायर ने सबको चेतावनी देते हुए एक घोषणा करवाई थी । ‌‌‌उसने कहा कि अमरतसर के निवासियों को सूचित किया जाता है कि यदि वे किसी भी सरकारी सम्पति को नुकसान पहुंचाते हैं और अमरतसर के निवासियों को हिंसा करने के लिए भड़काते हैं तो उनको दंडित किया जाएगा । ‌‌‌और सभी बैठकों पर प्रतिबंध लगाया जाता है। और भीड़ को तितर बितर कर दिया जाएगा ।उसके बाद डायर ने 13 अप्रेल 1919 को एक घोषणा फिर की थी ।

‌‌‌सभी को ऐलान किया जाता है कि कोई भी व्यक्ति निम्न लिखित अधिकारियों को सूचित किये बिना शहर छोड़कर नहीं जा सकता । यदि कोई पैदल या साधन के अंदर बैठकर जाता हूआ दिखाई दिया तो उसे गिरफतार कर लिया जाएगा । ‌‌‌और अमरतसर के निवासियों को रात्री 8 बजे के बाद बाहर निकलने की ईजाजत नहीं है। यदि कोई रात्री 8 बजे के बाद बाहर घूमता हुआ पाया जाएगा तो उसे गोली मादी जाएगी ।

‌‌‌पुलिस कमिश्नर और अन्य अधिकारियों के साथ डायर ने पूरे शहर का चक्कर लगाया । दो पुलिस वाले घोड़े पर सवार होकर आगे आगे चल रहे थे । और एक व्यक्ति पंजाबी भाषा के अंदर गला फाड़ फाड़ कर इस सूचना को लोगों तक पहुंचा रहा था । ‌‌‌डायर और इर्विन एक कार मे बैठे बीच मे चल रहे थे । उनके पीछे पुलिस चल रही थी । इसी तरह से डायर ने कई जगहों पर जाकर यह संदेश पहुंचाया । ‌‌‌जनरल डायर के द्वारा किये गए ऐलान की वजह से जनता के अंदर और अधिक आक्रोश फैल गया । जबकि नेता इस संबंध मे एक सभा करना चाहते थे । पहले यह सभा स्वर्ण मंदिर के अंदर होनी थी । लेकिन सुंदर सिंह मिजिठिया के विरोध के बाद इस स्थान को टाल दिया गया ।

‌‌‌उसी दिन गुरूदता ने पूरे शहर के अंदर यह संदेश फैला दिया कि भाई जलियांवाला बाग के अंदर एक सभा होगी जिसके अंदर आपके प्यारे नेता कन्हैयालाल होंगे और टींकू और सत्यपाल जनता के नाम संदेश पढ़कर सुनाएंगे । ‌‌‌नेताओं ने कहा कि डायर केवल एक थोथी कल्पना कर रहा है। जिसकी वजह से लोगों को यह विश्वास हो गया । शाम 4 बजे के बाद जब डायर के पास यह सूचना पहुंची की लोग उसके ऐलान के बाद सभा कर रहे हैं तो उसने एक गुप्तचर से सूचना की पुष्टी करली । और उसने

‌‌‌डायर ने अपने साथ 10 सैनिक और 2 मसीन गन युक्त गाडियां लेली और वह खुद जलियांवाला बाग की तरफ चल निकला । इसके अलावा अन्य सैनाओं की टुकडियों को शहर के महत्वपूर्ण जगहों पर तैनात करदिया गया था । ‌‌‌डायर और ब्रिक्स कार के अंदर बैठे थे ।उनके पीछे दो मसीन गन गाडी और एक पुलिस की कार चल रही थी ।उनके पीछे सिपाही चल रहे थे और आगे आगे एक मागदर्शक चल रहा था ।यह सैनिक जुलुस हाल चौक से होता हुआ जलियांवाला बाग पहुंचा । वहां पर लेखक लिखता है कि यही कोई 25 हजार के आस पास लोग थे ।

‌‌‌डायर के आने से पहले 8 नेता अपना भाषण पूरा कर चुके थे । और एक कर्ल्क कुछ बोल रहा था । उसकी पंक्तियां इस प्रकार से थी।

अफसर ए आला ने हमको आज दी हैं धमकियां

कि बाजूं काट लेंगे हम पैरों को नोच लेंगे हम

पर हर मौसमे खिजा के बाद बहार लाजिम है हुजूर

खुद ब खुद निकल आएंगे तब और गुंछे खिल उठेंगे।

‌‌‌उसके बाद वहां पर पास मे एक हवाई जहांज ने उड़ान भरी और तिरंगा फहराया । जिससे देखकर लोग डर गए । बाद मे लोगों से कहा गया कि डरने की कोई बात नहीं है। हवाई जहाज अपना काम कर रहा है तुम अपना काम करो ।

‌‌‌डायर खुद एक उंचे स्थान पर खड़ा हुआ था । और जलियांवाला बाग के अंदर रंग बिरंगी भीड़ को देखकर आश्चर्य चकित रह गया था । आज बैसाखी का दिन था । पंजाब के अंदर इसका विशेष महत्व है। ‌‌‌इस दिन लोग स्वर्ण सरोवर मे स्नान करने के लिए भी आते हैं। इसके अलावा गोविंदगढ़ के निकट पशुओं का मेला भी लगता है। लोग मेला देखने के लिए भी आए हुए थे । इन लोगों को जब सभा का पता चला तो वे भी सभा देखने जा पहुंचे ।

‌‌‌जब डायर ने देखा कि सबसे ज्यादा लोग पिपल के पेड़ के नीचे हैं तो अपनी सेना को वहां पर तुरन्त तैनात कर दिया ।

‌‌‌धुलिया धोबी का साहस

धुलिया धोबी ने जब जनरल डायर को देखा तो वह उसके पास दौड़कर आया और बोला हम तुम्हारी गोलियों से डरने वाले नहीं हैं। मर जाएंगे लेकिन तुम्हारे आगे सर नहीं झुकाएंगे ।उसके बाद डायर कूत्ते नें सैनिकों को उसे भून देने का आदेश दिया और पल भर मे ही गोलियों की बौछार उमड़पड़ी । ‌‌‌उसके बाद नत्थू धोबी आया और एक सैनिक से गन छीन ली लेकिन चलाने से चूक गया और इतने मे उसका पूरा शरीर गोलियों से छल्ली हो गया । ‌‌‌सब तरफ से लोग घिर चुके थे । उनके भागने का कोई रस्ता ही नहीं बचा था । बस वे इधर उधर भाग रहे थे । उस वक्त प्रत्येक सिपाही धनाधन गोलियां चला रहा था । ऐसा कोई सिपाही नहीं था जिसको हवाई फायर करते हुए देखा गया होगा । ‌‌‌बहुत से लोग शहीद हो गए । कुछ लोग दम घुटने से मर गए तो कई लोग भीड़ की वजह से कुचले गए ।कुल मिलाकर सैनिकों को जब गोलियां चलाने को बद करने के लिय कहा गया तब उन्होंने गोलियां बंद की । उसके बाद जलियांवाला बांग ऐसा लगता था । जैसे कोई जंग का मैदान हो ।

‌‌‌गोलियों के निशान जलियावांला बाग

जहां पर अंग्रेजों ने गोलियां चलाई थी । वहां पर आज भी गोलियों के निशान बने हुए हैं। बहुत से लोग दिवारों पर बने इन गोलियों के निशानों को देखने के लिए जलियांवाला बाग मे जाते हैं। और पूरानी यादों को एक बार फिर ताजा करते हैं। बहुत सारे निशानों को देखकर पता ‌‌‌लग जाता है कि यहां पर कितनी गोलियां चलाई गई होंगी।

शहीदी कुँआ, जलियाँवाला बाग़, अमृतसर

शहीद कुंआ वह कुंआ है। जो जलियांवाला बाग के बीच मे था । जब अंग्रेजों ने अंधाधुन गोलियां चलाई तो बहुत से लोग डर गए । और यह सोचकर जिंदा ही कुए के अंदर कूद गए कि यदि वे कुए के अंदर कूदते हैं तो उनकी जान बच सकती है। कहा जाता है कि इस कुए मे लाशों का ढेर लग गया था। ‌‌‌बहुत से लोग कुए मे कूदने की वजह से भी मारे जा चुके थे ।अब इस कुए को शहीद का कुआ कहा जाता है। जिसको पर्यटक देखने आते हैं

‌‌‌अंग्रेज कुत्ते डायर का खात्मा

महान स्वतंत्रता सैनानी उधम सिंह जब 12 साल के थे । तब वे उस वक्त जलियांवाला बाग के अंदर मौजूद थे । जब यह कांड हुआ था । उनके मन पर इस का बहुत गहरा प्रभाव पड़ा था । जिसकी वजह से उन्होंने ठान लिया कि वे इन लोगों की मौत का बदला लेकर रहेंगे ।

‌‌‌उसके बाद उधम सिंह बहुत सारा पैसा एकत्रित किया और डायर को मारने के लिए लंदन गए । 13 मार्च 1940 को उन्होंने लंदन के कैक्सटन हॉल केअंदर डायर को गोली मारदी । अचानक से चली गोली से सारे अंग्रेज अधिकारी कांप गए । और उधम सिंह ने कहां मे किसी अन्य लोगों को चोट नहीं पहुंचाना चाहता हूं । ‌‌‌मेरी जिंदगी का मकसद पूरा हो चुका है। यदि उधम सिंह चाहते तो वहां पर अन्य अंग्रेज अधिकारियों के सीने मे गोली उतार सकते थे । लेकिन ऐसा नहीं किया ।31 जुलाई 1940 को उधम सिंह को फांसी पर लट का दिया गया था ।

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