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    Home»‌‌‌धर्म और त्यौहार»क्या आप जानते हैं सबसे पहले गणेश जी की पूजा क्यों होती है ?
    ‌‌‌धर्म और त्यौहार

    क्या आप जानते हैं सबसे पहले गणेश जी की पूजा क्यों होती है ?

    arif khanBy arif khanFebruary 21, 2019Updated:February 21, 2019No Comments11 Mins Read
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    ganesh
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    आप के मन मे यह सवाल  कभी ना कभी आया होगा कि सबसे पहले गणेश जी की पूजा क्यों की जाती है? और संभवत आपने इसका हल नेट पर खोजने की कोशिश भी कही होगी । इस लेख के अंदर हम आपको विस्तार से बताने वाले हैं कि सबसे पहले गणेश जी की पूजा क्यों की जाती है। किसी भी काम के अंदर जब उस काम को आरम्भ किया ‌‌‌जाता है। तो गणेश जी की पूजा होती है। आप जब दुकान का उदघाटन करते हो या कोई जागरण वैगरह लगाते हो या कोई भी शुभ काम करते हो तो भगवान गणेश को एक बार जरूर याद किया जाता है।

    ‌‌‌गणेश शिव और पार्वती के पुत्र हैं। और उनका वाहान डिंक नामक माषूक है।गणों का स्वामी होने के कारण गणेश जी को गणपति भी कहा जाता है। हाथी जैसा सिर होने की वजह से उन्हें गणपति कहा जाता है । और हिंदु धर्म के अंदर किसी भी काम को करने से पहले उनको सर्वप्रथम पूजा जाता है। गणेशजी को मानने वाले  सम्प्रदाय गाणपतेय ‌‌‌कहलाते हैं।

    Table of Contents

    • सबसे पहले गणेश जी की पूजा क्यों होती है ?
      • ‌‌‌कथा न 1
        • ‌‌‌कथा का सारांश
      • ‌‌‌कथा नम्बर 2
        • ‌‌‌कथा का सारांश
      • ‌‌‌कथा नम्बर 3
    • सबसे पहले गणेश जी की पूजा क्यों होती है ?
      • ‌1. ऋद्धि -सिद्धि का स्वामी
      • 2. बुद्धि-चातुर्य के कारण
      • 3. विघ्नहर्ता
      • ‌‌‌4. भगवान गणेश को प्राप्त वरदान
      • ‌‌‌5.उचित अनुचित और कतर्व्य अकतर्व्य के ज्ञान के लिए
      • 6. ‌‌‌मनोरथ पूर्ण करने के लिए
    • ‌‌‌मौजूद हैं अनेक कथाएं
    • ‌‌‌शिव पार्वती के विवाह मे हुई गणेश जी की पूजा

    सबसे पहले गणेश जी की पूजा क्यों होती है ?

    ‌‌‌भगवान गणेश की पूजा सबसे पहले क्यों होती है। इसके पीछे कई पौराणिक कथाएं मौजूद हैं और इन कथाओं के आधार पर हम आपको यह समझाने की कोशिश करेंगे की भगवान गणेश को सबसे पहले क्यों पूजा जाता है।

    ‌‌‌कथा न 1

    पहली कथा के अनुसार जब शिव ने गणेश जी का सर काट दिया तो माता पर्वती बहुत अधिक क्रोधित हो गई और बोली की यदि उनका बेटा वापस जीवित नहीं हुआ तो वह पूरी दुनिया को खत्म करदेगी । सब कुछ नष्ट कर देगी । जिससे भगवान शिव भी एक बार बहुत अधिक घबरा गए और अपने सेवको को आदेश दिया की उस ‌‌‌व्यक्ति  का सर लेकर आओ जिसकी मां उसकी तरफ पीठ करके खड़ी  हो सेवक बहुत अधिक घूमे लेकिन इंसानों के अंदर तो  ऐसा कुछ मिला नहीं तो उन्होंने एक हाथी के बच्चे और उसकी मां को इस स्थिति के अंदर पाया। उसके बाद वे हाथी का सर काटकर भगवान शिव के पास लेकर आए।

    ‌‌‌भगवान शिव ने अपनी शक्तियों से हाथी के सर को गणेश के धड़ से जोड़ दिया और भगवान गणेश जीवित हो गए । लेकिन इससे पार्वती पूरी तरह से संतुष्ट नहीं हुई और कहा कि ऐसे तो सभी देवता मेरे पुत्र का मजाक बनाएंगे । तब भगवान शिव ने गणेश को सर्वप्रथम पुज्य जाने का वरदान दिया । बस इसी वजह से

    ‌‌‌सबसे पहले गणेश जी की पूजा होती है।

    ‌‌‌कथा का सारांश

    इस कथा के अनुसार गणेश जी को इस वजह से पहले पूजा जाता है क्योंकि उनको पहले पूजा जाने का वरदान प्राप्त है। और यह भगवान शिव का वरदान है। यदि उनकी पूजा नहीं होती है तो वहां पर कार्य के अंदर अनेक बाधाएं आने लगती हैं।

    ‌‌‌कथा नम्बर 2

    सबसे पहले गणेशजी की पुजा क्यों की जाती है। इस संबंध मे एक कथा और मिलती है । इस कथा के अनुसार देवों को यह जिज्ञासा हुई कि सबसे पहले किस देवता की पूजा किया जाना चाहिए। सबसे पहले पूजा का अधिकार पाने के लिए सब देवता अपने अपने को श्रेष्ठ बताने लगे । और उनके अंदर झगड़ा बहुत अधिक ‌‌‌बढ़ गया तो देवता को नारदजी ने भगवान शिव मतलब भोले शंकर के पास जाने की सलाह दी ।तब सारे देवता एकत्रित होकर भगवान शिव के पास पहुंचे और समस्या का समाधान करने को कहा ।

    ‌‌‌शंकर भगवान ने पूरा विवाद सुनने के बाद एक प्रतियोगिता आयोजित की । उसके अनुसार सभी देवताओं को अपना अपना वाहन लेकर पूरी धरती के एक चक्कर लगाकर आना है। और जो सबसे पहले चक्कर लगाकर आएगा । उसे ही सबसे पहले पूजा जाएगा ।सारे देवता अपना अपना वाहन लेकर धरती का चक्कर लगाने निकल पड़े । ‌‌‌लेकिन भगवान गणेश वहीं खड़े रहे कुछ समय विचार किया और अपना वाहन लेकर अपने माता पिता के सात चक्कर लगाए और उसके बाद वहीं पर हाथ जोड़कर खड़े हो गए । जब देवता वापस आए तो भगवान शिव ने अपना निर्णय सुनाते हुए । कहा की भगवान गणेश सबसे पहले पूज्य जाने योग्य हैं । यह सुनकर सभी देवता काफी हैरान रह गए ‌‌‌और भगवान शिव से इसका कारण जानने की इच्छा जाहिर की । उसके बाद भगवान शिव ने बताया कि माता पिता को समस्त लोक के अंदर सर्वोच्च स्थान दिया गया है। जो देवताओं और सृष्टि  के अंदर सर्वोच्च माने गए हैं। ‌‌‌सभी देवता भगवान शिव के निणर्य से सहमत हुए । और उसी दिन के बाद सबसे पहले गणेशजी की पूजा होती है।

    ‌‌‌कथा का सारांश

    ‌‌‌इस कथा से यह साबित होता है कि भगवान गणेश बुद्धिबल  मे सबसे आगे हैं। और इसी बुद्धिबल  की वजह से भगवान गणेश को सबसे पहले पूजा जाता है।

    ‌‌‌कथा नम्बर 3

     ‌‌‌एक अन्य कथा के अनुसार जब सृष्टि  के आरम्भ मे यह प्रश्न बना की सबसे पहले किसे पुज्य माना जाए तो । समस्त देवता इस प्रश्न का हल निकालने के लिए ब्रह्मा  के पास पहुंचे । तब ब्रह्मा  जी ने कहा की उस देवता को सबसे पहले पूज्य माना जाएगा जो अपना वाहन लेकर ब्रह्रमांड का चक्कर सबसे पहले लगाएगा ।

    ‌‌‌गणेश जी का वाहन चूहा होने की वजह से वे ब्रह्रमांड के चक्कर भी आखिकर कैसे लगा पाते । तब उन्होंने अपने दिमाग मे कुछ सोचा और राम नाम लिखकर उसके चारो और सात चक्कर लगाने के बाद वे ब्रह्मा के पास पहुंचे ।‌‌‌क्योंकि राम शब्द राम का स्वरूप है और राम के अंदर ही सम्पूर्ण ब्रह्रमांड निहित है।‌‌‌इस कथा के अंदर भी भगवान गणेश की बुद्विमता का परिचय दिया गया है।

    सबसे पहले गणेश जी की पूजा क्यों होती है ?

    ‌‌‌अब तक हमने यह जाना की भगवान गणेश की सबसे पहले पूजा क्यों की जाती है। इसके पीछे की पौराणिक कथाओं के बारे मे । लेकिन अब हम यह जानेंगे कि भगवान गणेश की पूजा करने के पीछे कौनसे कारण मौजूद हैं। जो विभिन्न घटकों के विश्लेषण से निकल कर आते हैं।

    ‌1. ऋद्धि -सिद्धि का स्वामी

    भगवान गणेश की दो पत्नी ‌‌‌ऋद्धि -सिद्धि हैं। और जहां पर गणेश जी की पहले पूजा नहीं होती है। वह काम सफल नहीं होता है। यदि गणेश जी की पूजा होती है तो उनकी पत्नियां ऋद्धि-सिद्धि यशस्वी, वैभवशाली व प्रतिष्ठित बनाने वाली होती है। इसी वजह से गणेश जी की पूजा सबसे पहले की जाती है।

    2. बुद्धि-चातुर्य के कारण

    गणेशजी की पूजा सबसे पहले उनके बुद्धि-चातुर्य के कारण  भी की जाती है। आयोजित प्रतियोगिता गणेश जी ने अपनी बुद्वि कौशल से ही जीती थी। गणेश जी के बुद्धि-चातुर्य को सब देवताओं मे सबसे उपर माना जाता है। और इसी वजह से वे हर समस्या का समाधान आसानी से कर सकते हैं। ‌‌‌इसी वजह से गणेश जी की सबसे पहले पूजा होती है। ‌‌‌गणेश जी के चातुर्य की वजह से शिव ने तो यह कहा था कि तुमसे चतुर कोई नहीं होगा ।

    3. विघ्नहर्ता

    गणेश जी की पूजा विघ्नहर्ता  की वजह से भी की जाती है।  इस संबंध मे एक पौराणिक कथा भी मिलती है कि एक बार जब  देवता गोमती नदी के तट पर यज्ञ कर रहे थे तो यज्ञ के अंदर अनेक बाधाएं आने लगी । बार बार कोशिश करने के बाद यज्ञ सम्पन्न नहीं हो रहा था तो ‌‌‌सब देवता ब्रह्मा  जी के पास पहुंचे और यज्ञ पूरा ना होने का कारण पूछने लगे । तब ब्रह्मा  जी ने बताया की यज्ञ को पूरा करने के लिए जो बाधाएं आ रही हैं उनको तो गणेश जी ही दूर कर सकते हैं। उसके बाद देवताओं ने विधि पूर्वक गणेश जी की पूजा की तो इससे भगवान गणेश प्रसन्न हो गए और यज्ञ के अंदर आने वाली ‌‌‌बाधाओं  को दूर कर दिया । सबसे पहले गणेश जी की पूजा इस वजह से भी की जाती है ताकि कार्य के अंदर कोई भी बाधाएं ना आएं ।

    ‌‌‌4. भगवान गणेश को प्राप्त वरदान

    भगवान गणेश ने जब अपने माता पिता के चक्र को पूरा करके प्रतियोगिता को जीत लिया तो भगवान शिव ने प्रसन्न होकर कहा कि तुमसे कोई चतुर नहीं है और तुमने अपने माता पिता की परिक्रमा को पूरा करने तीनों लोकों की प्ररिक्रमा का पुण्य पा लिया है।  जो मनुष्य किसी भी ‌‌‌शुभ कार्य करने से पहले तुम्हारी पूजा करेगा उसके कार्य के अंदर किसी भी प्रकार की कोई भी बाधा नहीं आएगी । ‌‌‌ऐसा माना जाता है कि पर्वती के शाप के कारण शंकरजी ने क्रोधित होकर अपना सिर धुना तो उससे हाथी के सिर वाले अनेक विनायक गण प्रकट हुए और इससे देखकर देवता गण घबरा गए और बोले की महादेव आप यह वरदान दें कि यह विनायक गण आपके पुत्र के वश मे हों । बस उसके बाद भगवान शिव ने कहा कि ‌‌‌सभी क्रूरूर दृष्टि  वाले विनायक तुम्हारे वश मे होंगे और कोई भी शुभ काम करने से पहले तुम्हारी पूजा होगी । अन्यथा काम के अंदर तुम बाधाएं पैदा कर सकते हो । और उसके बाद से ही लोग कार्य को अच्छे से सिद्व होने के लिए सबसे पहले गणेश जी की पूजा करते हैं।

    ‌‌‌5.उचित अनुचित और कतर्व्य अकतर्व्य के ज्ञान के लिए

    भगवान गणेश को उचित अनुचित और कतर्व्य अकतर्व्य के ज्ञान के लिए जाना जाता है। यदि भगवान गणेश रूठ जाते हैं। तो व्यक्ति को इन सब चीजों का ज्ञान नहीं रहेगा तो कार्य सिद्व हो नहीं पाएगा । इस वजह से भी सबसे पहले गणेश जी की पूजा की जाती है।

    6. ‌‌‌मनोरथ पूर्ण करने के लिए

    ‌‌‌भगवान गणेश को मनोरथ पूर्ण करने वाला भी माना जाता है। प्राचीन ग्रंथों के अंदर एक कथा मिलती है। जिसके अनुसार एक बार जब भगवान शिव त्रिपुरासुर का वध करने की कोशिश कर रहे थे तो उनके काम मे विध्वन पड़ रहा था। बार बार कोशिश करने के बाद भी वे अपना मनोरथ पूर्ण नहीं कर पा रहे थे ।‌‌‌तब महादेव को ज्ञात हुआ कि वे तो भगवान गणेश की पूजा अर्चना किये बिना ही आ गए । उसके बाद महादेव ने भगवान गणेश को भोग लगाया और उसके बाद ही वे त्रिपुरासुर को मारने मे सफल हुए थे ।

    ‌‌‌मौजूद हैं अनेक कथाएं

    सबसे पहले गणेश जी की पूजा न करे से क्या होता है ? इस संबंध मे कुछ कथाएं भी मौजूद हैं। ऐसा माना जाता है कि यदि आप किसी भी शुभ कार्य को करने से पहले गणेश जी की पूजा नहीं करते हैं तो कार्य शांति से पूरा नहीं हो पाता है। और कार्य के अंदर बाधाएं ‌‌‌लगती हैं।

    ‌‌‌एक स्थानिय लोक कथा के अनुसार एक व्यक्ति की बेटी की शादी थी। शादी जैसे शुभ अवसर पर गणेश जी की पूजा की जानी जरूरी होती है। लेकिन वह व्यक्ति नास्तिक था तो उसने भगवान गणेश की पूजा नहीं करवाई । ‌‌‌जिससे भगवान गणेश अप्रसन्न हो गए । और जब बारात आई तो कुछ समय बाद ही खाना पीना सब कुछ खत्म हो गया । कोई कुछ भी समझ नहीं पा रहा था कि इतना सामान बनाने के बाद भी सब कुछ कैसे खत्म हो गया ।उस व्यक्ति ने दोबारा सामान बनाया लेकिन बारात पूरी खाना खा भी नहीं पाई और ‌‌‌दूबारा सब कुछ खत्म हो गया । उसके बाद किसी ने उस व्यक्ति को सलाह दी की गणेश जी की पूजा करवाई जाए। तब गणेश जी की पूजा हुई तो काम सही ढंग से सम्पन्न हुआ  । मतलब यह माना जाता है कि गणेश की पूजा करने से हर काम अच्छे से सपन्न होता है।

    ‌‌‌शिव पार्वती के विवाह मे हुई गणेश जी की पूजा

    आपको बतादें कि शिव पार्वती के विवाह के अंदर भी गणपति की पूजा हुई थी। हालांकि उस समय गणपति का जन्म नहीं हुआ था। तो उनको अग्र पूज्य जैसा कोई अधिकार नहीं था। लेकिन  इस संबंध मे आपको बतादें कि शिव पार्वती के विवाह के अंदर महागणपति की पूजा‌‌‌आपको बतादें कि गणपति किसी के पुत्र नहीं हैं वे आदि और अनन्त हैं और इनका उल्लेख वेदों के अंदर भी मिलता है। और भगवान गणेश उनके अवतार हैं। जब शिव ने गणपति की आराधना की कि वे उनके घर के अंदर पुत्र के रूप मे पैदा हों ।‌‌‌तो इसमे आपको कन्फयूज होने की आवश्यकता नहीं है। कि गणेश की पूजा शिव पार्वती के विवाह के अंदर कैसे हुई ?

    ‌‌‌इस संबंध मे तुलसीदास जी का एक श्लोक भी है

    मुनि अनुशासन गनपति हि पूजेहु शंभु भवानि।

    कोउ सुनि संशय करै जनि सुर अनादि जिय जानि’

    ‌‌‌जिसका अर्थ है मुनियों के निर्देश पर शिव और पर्वती ने गणपति की पूजा सम्पन्न की , कोई संशय न करे क्योंकि गणपति अनादि होते हैं।

    सबसे पहले गणेश जी की पूजा क्यों होती है ?

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