dil ki sune ya dimag ke दिल और दिमाग मे कौन सही है ?

‌‌‌दिल की सुने या दिमाग की dil ki sune ya dimag ke  बहुत बार हम दिल और दिमाग मे फंस जाते हैं। इस लेख के अंदर हम बात करने वाले हैं ‌‌‌दिल की सुने या दिमाग की पर ।

बहुत बार हम एक समस्या के अंदर फंस जाते हैं। मतलब निर्णय लेने मे हमे समस्या होती है। दिल और दिमाग आपस मे लड़ने लग जाते हैं। और हम सोचते हैं कि हमे किसकी सुननी चाहिए दिल की या दिमाग की ? कौनसा सही कह रहा है और कौनसा गलत कह रहा है? ‌‌‌इस तरह से हम कई बार तो बुरी तरह से कसमकस के अंदर फंस जाते हैं। ऐसा सिर्फ एक व्यक्ति के साथ नहीं होता है। वरन हम सभी के साथ होता है। हमारे सामने कई ऐसे मुददे आ जाते हैं जिसमे दिल और दिमाग आमने सामने हो जाते हैं। ‌‌‌dil ki sune ya dimag ke

और हम खुद इन दोनों के बीच मे फंस जाते हैं। एक बार हम सोचते हैं कि दिमाग सही कह रहा है तो दूसरी बात हम अपनी भावनाओं से खिलवाड नहीं कर सकते और सोचते हैं कि दिल सही कह रहा है। हमे उसकी बात मान लेनी चाहिए। ‌‌‌वैसे देखा जाए तो दिल और दिमाग का अपना अपना महत्व होता है। दोनों का होना जरूरी होता है। और यह दोनों एक दूसरे के पूरक भी हैं। फिर भी यह कभी कभी झगड़ने लगते हैं। आगे जानने से पहले दिल और दिमाग के बारे मे थोड़ा जान लेते हैं।

‌‌‌‌‌‌दिल की सुने या दिमाग की दिल क्या है ?

दोस्तों दिल का मतलब वैसे हर्ट से होता है। जो हमारे शरीर के अंदर खून की सप्लाई करने के लिए जिम्मेदार होता है। लेकिन यदि साहित्यक तरीके से बात करें तो दिल दिमाग  दोनों के अंदर विचार पैदा होते हैं। इस वजह से दोनों आमने सामनें होते हैं। सच मे ऐसा कुछ नहीं हैं । हां कुछ ‌‌‌हद तक दिल इंसान के दिमाग को प्रभावित भी करता है। जिसको रिसर्च के अंदर प्रमाणित भी किया जा चुका है। लेकिन इतना ज्यादा नहीं कि वह विचार ही पैदा करने लगे । अब आपके दिमाग मे यह प्रश्न उठता होगा कि दिल यदि दिल नहीं है तो दिल क्या है ?

इस चीज को समझने के लिए हम आपको बड़ी ही सिंपल ‌‌‌कि जो विचार हमारी भावनाओं से जुड़े हुए होते हैं। उनको साहित्यक भाषा मे दिल की संज्ञा दी जाती है। जैसा कि भावनाएं पॉजिटिव हो सकती हैं या फिर अन्य प्रकार की । उदाहरण के लिए हम किसी लड़की को दिल से चाहते हैं तो इसका अर्थ है लड़की के साथ हमारी भावनाएं जुड़ी हुई हैं। ‌‌‌दूसरी बड़ी बात भावनाएं तर्क से अलग होती हैं। इनके अपने नियम होते हैं। भावनाओं के अंदर इंसान यह नहीं देखता है कि क्या गलत है और क्या सही है? ‌‌‌इस वजह से यह कहा जा सकता है कि दिल से जो निर्णय लिए जाते हैं वो तटस्थ होते हैं। उनमे भावनात्मक झुकाव मौजूद होता है।

‌‌‌‌‌‌दिल की सुने या दिमाग की दिमाग क्या है ?

दिमाग का वैसे मतलब होता है हमारा पूरा ब्रेन से । दिमाग जो कहता है वह दिमाग का विचार है। आपको बतादें कि दिल जो कहता है वह भी एक दिमाग का विचार होता है। लेकिन उसमे सही गलत नहीं देखा जाता है। और इस वजह से उसे दिल का विचार कह सकते हैं। जबकि दिमाग जो कहता है वह दिल के ‌‌‌विचार के समान भी हो सकता है। और उससे अलग भी हो सकता है। दिमाग दिल के विचार का विश्लेषण करता है। उसके बाद यदि दिल का विचार सही है तो वह दिल के विचार को अपना लेता है। जिससे दिमाग और दिल का विचार दोनों एक होते हैं। लेकिन यदि दिमाग इसको गलत साबित कर देता है तो समस्या पैदा होती है

‌‌‌तब आप सर्च करने लग जाते हैं कि दिल की सुने या दिमाग की ? ‌‌‌अब तक आप यह तो जान ही चुके होंगे कि दिमाग और दिल किसको कहा जा रहा है। अब हम यह भी जानने का प्रयास करते हैं कि आपको दिल की सुननी चाहिए या दिमाग की ? और आपको कब किसकी सुननी चाहिए ।

 

‌‌‌दिमाग हमेशा दिल से ज्यादा सही होता है ?

कुछ मामलों को यदि आप छोड़देते हैं तो हमारा दिमाग दिल से ज्यादा सही होता है। इसका मतलब है कि दिमाग जो कहता है वह सही कहता है । दिमाग के ज्यादा सही होने की वजह यह है कि दिमाग तर्क कर सकता है । उसका निर्णय भावनाओं के आधार पर नहीं होता है।‌‌‌और इस बात का एहसास हमे भी होता है। बहुत बार जब हम कोई गलत काम कर रहे होते हैं तो हमारा दिमाग यह कहता है कि यह काम मतकरो क्योंकि यह गलत है। लेकिन हमारा दिल दिमाग की एक नहीं सुनता है।

‌‌‌दिमाग कुछ ऐसे मामलों के अंदर गलत साबित हो जाता है जो दिल की मदद से  आसानी से किये जा सकते हैं। जैसे आपका दिमाग कहता है कि यह काम मत करो क्योंकि इसमे आपको सक्सेस होने मे लंबा समय लग सकता है। लेकिन आपका दिल कहता है नहीं यही करो ।‌‌‌और ऐसी स्थिति के अंदर आपको पता ही है दिल से किये गए काम और ज्यादा सक्सेस होते हैं।

‌‌‌दिल के साथ दिमाग बेहतर तरीके से काम करता है

भले ही आपका एक विचार किसी दिल से जुड़े काम का विरोध कर रहा हो लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि पूरा दिमाग ही आपके काम का विरोधी हो गया हो । यदि आप दिल की मानेंगे तो आपके दिमाग को आपका साथ देना पड़ेगा और ऐसी स्थिति के अंदर आप और अधिक अच्छे ‌‌‌ढंग से काम कर पाएंगे ।  दिमाग का विरोधी होने का अर्थ है कि वह खुद को संतुष्ट करना चाहता है कि आपका दिल जो कह रहा है वह सही है या गलत है ? दिमाग चाहता है कि आप उसका विश्लेषण करें और पक्ष विपक्ष रखें तो बेहतर होगा।

‌‌‌दिल अधिकतर मामलों मे सही नहीं होता है

जो विचार हमारी भावनाओं से जुड़े होते हैं वे अधिकतर केसों के अंदर गलत हो जाते हैं। दिल से जुड़े कुछ विचार यदि मैं आपको बताउं तो वे आपको गलत ही लगेंगे । इसी वजह से अक्सर कहा जाता है कि दिल नादान चीज है। ‌‌‌जो सोच समझता नहीं है। और कुछ भी निर्णय ले लेता है। कुल मिलाकर दिल हमारी भावनाओं से जुड़ा हुआ है। इस वजह से भावनात्मक निर्णय लेता है। जबकि दिमाग बुद्वि वाली चीज है। जिसका अपना महत्व है। दिल और दिमाग एक दूसरे के पूरक  हैं। एक के बिना दूसरे का काम नहीं हो सकता है।

dil ki sune ya dimag ke

‌‌‌जैसे बहुत से निर्णय जैसे किसी की हत्या करने का निर्णय , रेप करने का निर्णय और गलत लड़की से शादी करने का निर्णय दिल से लिए जाने की वजह से बाद मे समस्या होती है। लेकिन दिल सिर्फ उन्हीं निर्णयों के अंदर शामिल होता है। जोकि दिल से जुड़े हुए हैं।

‌‌‌दिल की सुने या दिमाग की ?

पीछले दिनों एक यूजर ने मेरे को ई मेल किया और पूछा की सर मे बहुत अजीब समस्या से परेशान हूं । मुझे यह बताएं कि मुझे अपने दिल की सुननी चाहिए या अपने दिमाग की ? ‌‌‌मैं आपको इतना नहीं बता सकता की आपको दिल सुननी चाहिए या दिमाग की ?

लेकिन मैं आपको इतना जरूर बता सकता हूं कि आपको दिल और दिमाग दोनो की सुननी चाहिए । और दोनों को एक करने की कोशिश करनी चाहिए । ‌‌‌आपका दिल यदि कुछ कहता है और आपका दिमाग कुछ और कहता है तो ऐसी स्थिति मे चीजों को गहराई से विश्लेषण करना चाहिए और उसके बाद ही कुछ करना चाहिए । गहराई से विश्लेषण करेंगे तो आपको पता चल ही जाएगा कि कौन सही है ? और कौन गलत है। ‌‌‌वैसे यह इस बात पर निर्भर करता है कि आपका दिल और दिमाग किस बात पर आमने सामने हैं।

‌‌‌दिल या भावनाएं की आवश्यकता क्यों है ?

आप यह सोच सकते हैं कि भगवान ने इंसान को दिमाग दिया है तो भावनाएं या पॉजिटिव नगेटिव प्रभाव क्योंदिय हैं? इसके पीछे का अर्थ क्या है ? इसके लिए हम आपको बतादें कि बिना भावनाएं इंसान जिंदा नहीं रह सकता । इंसान ही नहीं जानवरों के अंदर भी फीलिंग होती ‌‌‌है। एक रोबॉट को लें उसे जो निर्देश दिया जाता है वह वैसे ही काम करता है। यदि रोबोट के पास खुद की सोचने समझने की पॉवर हो तो वह किसी चीज से डरेगा नहीं । उसके अंदर फीलिंग नहीं होगी । ऐसी स्थिति के अंदर रोबोट तो जी लेगा क्योंकि वह मेटल का बना है। लेकिन इंसान को फील करने की आवश्यकता होगी ।

‌‌‌क्योंकि उसकी बोड़ी मेटल की नहीं बनी हुई है। उसे शरदी गर्मी से बचना होगा ।

‌‌‌दिल की सुने या दिमाग की अंतिम शब्द

लेख के अंत मे हम आपको सिर्फ इतना कहना चाहेंगे कि दिल एक प्राइमरी सोर्स है। उसका दिया गया निर्णय हमेशा ही सही हो कोई जरूरी नहीं है। इस वजह से सिर्फ दिल की ही ना सुने  वरन दिमाग की भी सुने । दिल जब कहता है तो वह दिमाग के पास जाता है। उसके बाद दिमाग ‌‌‌उसे फिल्टर करता है। उसके बाद बोलता है। सो दिल की ना माने वरन दिल और दिमाग की बाने तो सबसे बेस्ट है। यदि केवल दिमाग की मानते हैं तो कम बेस्ट है। और केवल दिल की सुनते हैं तो ना के बराबर है।

‌‌‌दिल की सुने या दिमाग की स्टोरी

‌‌‌एक बार एक सन्यासी एक जंगल से होकर गुजर रहा था । उसे प्यास लगी तो उसने पानी इधर उधर देखा तो उसे पास ही एक तालाब नजर आया । वह तालाब की ओर चल दिया तालाब के पास गया तो तालाब  के पास लिखा हुआ था । इस तालाब का पानी सावधानी पूवर्क पीये क्योंकि इसके अंदर जहरीला सांप रहता है। ‌‌‌सन्यासी ने सब पढ़ा लेकिन उसने पहले तो सोचा कि मुझे पानी नहीं पीना चाहिए । लेकिन उसके दिल ने कहा कि नहीं पानी पी लेना चाहिए आगे पता नहीं पानी मिले या ना मिले ।उसका दिमाग संतुष्ट नहीं हुआ । उसके बाद सन्यासी ने इधर उधर देखा उसे कुछ नहीं दिखा तो वह पानी पीने लगा । ‌‌‌इतने मे एक सांप आया और उसे खा गया ।

‌‌‌उसके कुछ समय बाद वहां से कोई और सन्यासी गुजरा उसे भी प्यास लगी तो वह उस तालाब के पास आया और उसके पास लिखे वाक्य पढ़े तो उसके दिल ने कहा पानी पीना चाहिए । लेकिन उसका दिमाग इस बात से संतुष्ट नहीं हुआ ।उसने दिल की बात नहीं मानी और तालाब को छोड़कर चला गया । लेकिन आगे जब वह बहुत दूर चला गया ‌‌‌तो उसे पानी नहीं मिला । इस वजह से वह प्यास से मर गया ।

‌‌‌उसके कुछ समय बाद वहां से कोई और संयासी गुजरा उसी भी प्यास लगी तो वह उस तालाब के पास आया और उसके पास लिखे वाक्य को पढ़ा । वह सब कुछ समझ चुका था । उसने एक युक्ती निकाली और तालाब के अंदर एक चूहा मार कर फेंका । लेकिन उसने देखा कि तालाब से कोई जहरीला सांप नहीं निकला । उसने ऐसा कई बार किया लेकिन ‌‌‌परिणाम हर बार समान रहा । उसके बाद वह तालाब से पानी पिया और चला गया।

इस स्टोरी को बताने का मकसद है दिल की सुने या दिमाग की इस प्रश्न का सही सही उत्तर आपको देना । यदि आप केवल दिल की सुनेंगे तो आप मुश्बित मे पड़ सकते हैं। यदि आप केवल दिमाग की सुनेंगे तो हो सकता है परेशानी आए और आप उसका ‌‌‌मुकाबला करने मे फैल हो जाएं । लेकिन यदि आप दोनों की सुनते हैं तो आप हर तरह से सही हैं।

‌‌‌क्या आपने कभी सोचा है कि  सरकारी नौकरी की तैयारी तो बहुत से लोग करते हैं। लेकिन कुछ लोग बहुत बार असफल होने के बाद भी अंत मे सफल हो जाते हैं। जबकि कुछ लोग निराश होकर सब कुछ छोंड़देते हैं। आपका दिल आपको एक स्पेसल पॉवर देता है। जिसकी मदद से आप कुछ भी पा सकते हैं। और जब आपका दिमाग पूरी तरह से ‌‌‌दिल के साथ होता है तो आप बेस्ट से बेस्ट भी कर सकते हैं।

‌‌‌दिल की सुने या दिमाग की यह लेख आपको कैसा लगा नीचे कमेंट करके बताएं।

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